20 जुलाई 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन ने बुलडोज़र से एक आरोपित का घर तोड़ने के मामले में फ़ैसला देते हुए लिखा कि राज्य की यह कार्रवाई काफी हद तक उस समाज की कथित खून की प्यास बुझाने के लिए है, जिसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर ‘बुलडोजर जस्टिस’ की खुराक दी जाती रही है। उन्होंने कहा कि राज्य को यकीन है कि समाज सामूहिक शाडनफ्रायड (collective schadenfreude) से ग्रस्त है। Schadenfreude जर्मन शब्द है। इसका मतलब है—दूसरे की मुसीबत, नुकसान या दर्द देखकर खुश होना। यानी किसी के गिरने, घर टूटने या सज़ा पाने पर मन ही मन संतोष या मज़ा आना।
कोई और वक़्त होता तो जस्टिस श्रीधरन की यह टिप्पणी समाज में बड़ी बहस का कारण बनती। लेकिन परपीड़ा में आनंद खोज रहे समाज में ऐसी बहस का होना, और असरदार भी होना निहायत मुश्किल है। हालाँकि समाज के सभ्य होने की यह कसौटी आज भी मान्य है—‘अपराध कितना भी घिनौना हो, सज़ा अदालत दे, भीड़ या वर्दी नहीं।’
बिहार के जमुई में 19 सितंबर 2026 की शाम जो हुआ, वह दिल दहला देने वाला था। कोचिंग से लौट रहे दसवीं के दो नाबालिग—एक लड़का, एक लड़की—मड़वा पहाड़ी के सुनसान इलाके में तस्वीरें खींचने गए थे। वहाँ कुछ युवकों ने उन्हें रोक लिया, लड़के से मारपीट की और लड़की के साथ अभद्र व्यवहार किया। घटना का वीडियो 21 सितंबर को वायरल हुआ तो वबाल मचा और पुलिस ने अगले ही दिन दो आरोपितों का ‘हाफ़ एनकाउंटर’ कर दिया। यानी पैर में गोली मारकर घायल कर दिया। एक बार फिर इस ‘तुरंता न्याय’ पर ताली बजने लगी। यह बताता है कि अपराधियों को सज़ा दिलाने की न्यायिक व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा उठ चुका है।
तालियों के शोर में यह बात दब गयी कि जमुई के इन कमउम्र अपराधियों की आख़िर ये समझ कैसे बनी कि अपने दोस्त के साथ घूम रही लड़की के साथ दुर्व्यवहार करने का उन्हें हक़ है? वे ख़ुद को संस्कृति रक्षक कैसे मान रहे हैं? क्या इसकी प्रेरणा उन्हें वैलेंटाइन डे पर पार्क-दर पार्क उत्पात मचाते बजरंग दलियों से नहीं मिली होगी? क्या कुछ किंतु-परंतु के साथ इस घटना की पीड़ित लड़की के कपड़े और चरित्र पर सवाल उठाने वाले नेता, मंत्री, पत्रकार आदि उन्हीं अपराधियों के पक्ष में नहीं खड़े है?
श्रेयसी सिंह बिहार सरकार में मंत्री हैं। उन्होने इस घटना पर कहा- ‘मॉरल पुलिसिंग (नैतिक पुलिसिंग) को और अधिक सभ्य और संभ्रांत तरीके से किया जा सकता है।’ एक महिला मंत्री मॉरल पुलिसिंग को जायज़ ठहरा रही है। प्रकारांतर में वे अपराधियों का पक्ष ही ले रही हैं। आरएसएस और बीजेपी की राजनीति अंतत: यहीं ले जाती है।
पीएम मोदी से ज़्यादा विज्ञापनों पर रोज़ाना ख़र्च करने वाले यूपी के मुख्यमंत्री महंत आदित्यनाथ का दावा है कि उनके राज में क़ानून व्यवस्था में ज़बरदस्त सुधार हुआ है। लेकिन आँकड़े गवाही देते हैं कि उनका अदालतों पर कोई भरोसा नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार के आँकड़ों के मुताबिक योगी आदित्यनाथ के नौ वर्षों में 17,043 एनकाउंटर हुए—लगभग रोज पाँच। इनमें 289 आरोपी मारे गए और 11,834 घायल हुए। ‘हाफ एनकाउंटर’ अब नीति बन चुका है। यानी जिसको सरकार ने ‘दोषी’ माना, उसे ‘ठोंक’ दिया गया। अगर ऐसा नहीं है तो मानना पड़ेगा कि यूपी में रोज़ाना पाँच से ज़्यादा बार पुलिस पर हमले होते हैं और आत्मरक्षा में पुलिस को गोली चलानी पड़ती है। यह तो अपराधियों के बुलंद हौसलों की मुनादी है न कि क़ानून व्यवस्था के बेहतर होने की।
बिहार में सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी यही भाषा सुनाई पड़ रही है कि ‘अपराधी सुबह का सूरज नहीं देखेंगे।’ स्पष्ट है कि एनकाउंटर अब होता नहीं, ‘किया’ जाता है। यह छूट वर्दीधारियों को हत्यारा बना देती है, इसके तमाम उदाहरण हैं। 11 नवंबर 2006 को पुलिस टीम ने वाशी से रामनारायण गुप्ता उर्फ लखन भैया और उनके दोस्त अनिल भेड़ा को उठाया। उसी शाम वर्सोवा के नाना-नानी पार्क में लखन भैया को गोली मार दी गई। पुलिस ने कहा—छोटा राजन गैंग का आदमी था, मुठभेड़ हुई। सालों बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने 19 मार्च 2024 को फैसला दिया। अदालत ने कहा कि लखन भैया को “ट्रिगर-हैप्पी” पुलिसवालों ने मारा और उसे असली एनकाउंटर जैसा दिखाने की कोशिश की गई। उधर, मुंबई के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहे जाने वाले पुलिस अफ़सर प्रदीप शर्मा को आख़िरकार फ़र्ज़ी एनकाउंटर मामले में उम्रकैद की सजा हुई। प्रदीप शर्मा कभी अख़बारों में छाये रहते थे और कहते हैं कि उन्हें ध्यान में रखकर फ़िल्में भी बनीं।
सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में पीयूसीएल मामले में सोलह दिशानिर्देश दिए। मौत होने पर तुरंत एफआईआर, स्वतंत्र जाँच, मजिस्ट्रेट इन्क्वायरी अनिवार्य है। कोर्ट ने फर्जी एनकाउंटर को राज्य प्रायोजित आतंकवाद कहा। हकीकत यह है कि ज्यादातर मामलों में इन्हीं दिशानिर्देशों की अनदेखी होती है। सजा के मामले गिने-चुने हैं, और वे भी दस-बीस-तीस साल बाद आते हैं। तब तक तालियाँ बज चुकी होती हैं, पदक बँट चुके होते हैं और परिवार टूट चुका होता है।
सबसे कड़वी विडंबना यह है कि जो नेता आज एनकाउंटर की भाषा बोलते हैं, उन पर खुद गंभीर मुकदमे रहे हैं। महंत आदित्यनाथ पर मुख्यमंत्री बनने से पहले हत्या की कोशिश समेत दंगा और नफरत फैलाने के कई मामले दर्ज थे। इसी तरह सम्राट चौधरी पर भी हत्याकांड में शामिल होने का आरोप है। अगर तब की सरकारें भी ‘जो अपराधी है उसे गोली मार दो’ वाली नीति अपनातीं, तो आज के कई नेता वजूद में भी न होते।
लोकतंत्र शक्तियों के बँटवारे पर टिका है। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका लागू करती है, न्यायपालिका फैसला सुनाती है। जब पुलिस सजा देने लगे—गोली से या बुलडोजर से—तो यह बँटवारा टूट जाता है। अनुच्छेद 21 जीवन का अधिकार देता है। जब तक अदालत दोष सिद्ध न करे, व्यक्ति निर्दोष माना जाता है। जमुई के आरोपियों को कानून के तरत सख्त सजा मिले। लेकिन वह सजा अदालत दे। अदालतें धीमी हो सकती हैं। समाधान उन्हें तेज बनाना है, उन्हें दरकिनार करना नहीं। जब सरकारें न्याय की जगह तमाशा बेचने लगती हैं, तो लोकतंत्र सिर्फ चुनाव और नारे का खोल रह जाता है। असली लोकतंत्र वही है जहाँ अपराधी सजा पाए, लेकिन सजा देने वाला कानून हो—भीड़ और वर्दी नहीं। समाज को खून का प्यासा बनाकर मूल सवालों पर पर्दा डालना आसान है लेकिन
खून का प्यासा समाज अंत में खून में नहाने को अभिशप्त होता है।






