नेत्रदान से दो लोगों को मिल सकती है रोशनी, नियमित जांच जरूरी: डॉ. दिनेश मिश्र

रायपुर। राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़े के अवसर पर सरस्वती शिशु मंदिर मठपुरैना में आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. दिनेश मिश्र ने कहा कि आंखें प्रकृति का अनमोल उपहार हैं और इनके जरिए हम दुनिया को देखते, सीखते और जीवन का आनंद लेते हैं। उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दृष्टि हानि के ज्यादातर कारणों की समय पर जांच, उचित उपचार और जागरूकता से रोकथाम की जा सकती है।

उन्होंने कहा कि जन्मजात आंखों की विकृतियों का समय पर परीक्षण कराने से कई समस्याओं का इलाज संभव है। बच्चों में विटामिन A की कमी से रतौंधी और कॉर्निया को गंभीर नुकसान हो सकता है, इसलिए हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर, पपीता, आम, दूध और अंडे जैसे पौष्टिक आहार लेना जरूरी है। बैक्टीरियल, वायरल और फंगल संक्रमण में लालिमा, दर्द, पानी आना और दृष्टि कम होने जैसी समस्या हो सकती है, इसलिए खुद से दवा लेने के बजाय नेत्र विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।

बच्चों और युवाओं में बढ़ रहे दृष्टि दोष

डॉ. मिश्र ने कहा कि निकट दृष्टि, दूर दृष्टि और एस्टिग्मैटिज्म जैसे दृष्टि दोष बच्चों और युवाओं में तेजी से बढ़ रहे हैं। नियमित नेत्र परीक्षण और सही नंबर का चश्मा जरूरी है। बढ़ती उम्र में मोतियाबिंद अंधत्व का सबसे सामान्य कारण है, लेकिन आधुनिक सर्जरी से इसका सफल उपचार संभव है। वहीं ग्लूकोमा बिना शुरुआती लक्षणों के धीरे-धीरे आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए 40 वर्ष की उम्र के बाद नियमित जांच जरूरी है।

उन्होंने बताया कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर का असर रेटिना पर पड़ सकता है और समय पर जांच व उपचार न मिलने पर स्थायी दृष्टि हानि हो सकती है। रेटिनल डिटैचमेंट को उन्होंने आपात स्थिति बताते हुए कहा कि अचानक चमक दिखना, काले धब्बे उड़ते दिखना या आंखों के सामने पर्दा गिरने जैसा महसूस होना इसके संकेत हो सकते हैं।

चोट, स्क्रीन और नेत्रदान को लेकर दी सलाह

डॉ. मिश्र ने आंखों की चोटों से बचाव पर भी जोर दिया। बच्चों की आंखों को खिलौने, पेंसिल, तीर-कमान और अन्य नुकीली वस्तुओं से चोट लग सकती है, जबकि वयस्कों में सड़क दुर्घटना, फैक्ट्री में काम, वेल्डिंग, एसिड, चूना और अन्य रसायनों से गंभीर नुकसान हो सकता है। दीपावली में पटाखों, बम और रॉकेट तथा होली में गुलाल और रंगों से आंखों की सुरक्षा के लिए सुरक्षात्मक चश्मे का इस्तेमाल करने की सलाह दी। रसायन आंख में जाने पर तुरंत साफ पानी से आंख धोकर अस्पताल पहुंचने को कहा।

उन्होंने मोबाइल, कंप्यूटर और डिजिटल स्क्रीन के अत्यधिक इस्तेमाल से होने वाली ड्राई आई, जलन, सिरदर्द, धुंधला दिखने और कंप्यूटर विजन सिंड्रोम जैसी समस्याओं से बचने के लिए 20-20-20 नियम अपनाने, बार-बार पलकें झपकाने, उचित रोशनी में काम करने और स्क्रीन से पर्याप्त दूरी रखने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि मृत्यु के बाद नेत्रदान से दो कॉर्नियल अंध व्यक्तियों को नई रोशनी मिल सकती है और इसे लेकर जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। नियमित नेत्र परीक्षण, संतुलित पौष्टिक आहार, स्वच्छता, सुरक्षात्मक उपायों तथा मधुमेह और उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण और समय पर उपचार से अधिकांश नेत्र रोगों से बचाव किया जा सकता है। कार्यक्रम को संस्था के सचिव देवेंद्र अग्रवाल ने भी संबोधित किया।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now