लेंस डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वीडियो फेसबुक से हटाए जाने के मामले ने अब राजनीतिक और कानूनी रूप ले लिया है। संसद की इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी (IT) संबंधी स्थायी समिति ने Meta के CEO Mark Zuckerberg से तीन दिनों के भीतर सार्वजनिक माफी मांगने को कहा है। समिति का कहना है कि अगर तय समय में माफी नहीं मांगी गई तो कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की जा सकती है।
क्या है पूरा मामला?
लोकसभा सचिवालय की ओर से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को एक पत्र भेजा गया है। यह पत्र 3 अगस्त को हुई संसदीय स्थायी समिति की बैठक के संदर्भ में लिखा गया है। इसमें कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक से हटाया जाना गंभीर मामला है और Meta को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
बताया गया कि प्रधानमंत्री का यह वीडियो कुछ समय के लिए फेसबुक से हटा दिया गया था। बाद में Meta ने इसे तकनीकी गलती बताते हुए दोबारा बहाल कर दिया। कंपनी का कहना था कि उसके AI आधारित ऑटोमैटिक कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम की वजह से यह वीडियो गलती से हट गया था।
भाजपा सांसद और संसदीय समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने कहा कि प्रधानमंत्री का वीडियो हटाना केवल किसी तकनीकी प्रक्रिया का मामला नहीं माना जा सकता। उनका कहना है कि इस मामले में Meta की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि मार्क जुकरबर्ग तीन दिनों के भीतर सार्वजनिक माफी नहीं मांगते हैं, तो Meta को मिल रही कानूनी सुरक्षा यानी Safe Harbour वापस लेने की प्रक्रिया शुरू करने की सिफारिश की जाएगी। साथ ही कंपनी को इंटरमीडियरी के बजाय पब्लिशर मानकर कार्रवाई करने पर भी विचार किया जा सकता है।
क्या है Safe Harbour सुरक्षा?
Safe Harbour सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के तहत सोशल मीडिया कंपनियों और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को मिलने वाली एक कानूनी सुरक्षा है। इस प्रावधान के तहत Facebook, Instagram, X, YouTube जैसे प्लेटफॉर्म पर कोई उपयोगकर्ता अगर कोई पोस्ट, वीडियो या टिप्पणी करता है, तो उसकी कानूनी जिम्मेदारी सीधे प्लेटफॉर्म पर नहीं आती। यानी यदि प्लेटफॉर्म कानून के अनुसार काम कर रहा है और आपत्तिजनक सामग्री की शिकायत मिलने पर तय नियमों का पालन करता है, तो उसे उस कंटेंट के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता।
इसी वजह से इन कंपनियों को ‘इंटरमीडियरी’ यानी केवल एक माध्यम माना जाता है, न कि उस कंटेंट का प्रकाशक।
Safe Harbour हटने पर क्या होगा?
अगर किसी कंपनी की Safe Harbour सुरक्षा समाप्त हो जाती है, तो उसके लिए कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल सकती है। ऐसी स्थिति में प्लेटफॉर्म पर मौजूद कंटेंट के लिए कंपनी की जिम्मेदारी बढ़ जाएगी।
कंपनी को ‘इंटरमीडियरी’ के बजाय ‘पब्लिशर’ माना जा सकता है।
विवादित या गैरकानूनी कंटेंट को लेकर सीधे कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई संभव हो सकती है।
अलग-अलग राज्यों में एफआईआर दर्ज होने और अदालतों में जवाब देने की नौबत आ सकती है।
कंटेंट मॉडरेशन और कानूनी अनुपालन को लेकर कंपनी पर अधिक जिम्मेदारी आ जाएगी।
हालांकि, किसी भी प्लेटफॉर्म की Safe Harbour सुरक्षा खत्म करना एक कानूनी प्रक्रिया है। इसके लिए संबंधित कानूनों और नियमों के तहत आवश्यक कार्रवाई करनी होती है।
किस वीडियो को लेकर शुरू हुआ विवाद?
विवाद उस वीडियो को लेकर है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छात्रों को संबोधित करते हुए NEET पेपर लीक के मुद्दे पर सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया था। इसे उनका पहला सेल्फी वीडियो भी बताया गया। यह वीडियो कुछ समय के लिए फेसबुक से हट गया था, जिसके बाद इस पर सवाल उठने लगे। बाद में Meta ने स्पष्ट किया कि वीडियो किसी नीति के उल्लंघन के कारण नहीं हटाया गया था, बल्कि AI आधारित ऑटोमैटिक मॉडरेशन सिस्टम की तकनीकी त्रुटि की वजह से ऐसा हुआ था।
अब नजर इस बात पर है कि Meta और उसके CEO मार्क जुकरबर्ग संसदीय समिति की मांग पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। यदि निर्धारित समय में माफी नहीं आती है, तो समिति की ओर से सरकार को आगे की कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की जा सकती है। हालांकि, अंतिम निर्णय संबंधित मंत्रालय और कानून के अनुसार ही लिया जाएगा।








