चुनावी तारीख के नजदीक आते ही बिहार के अखबारों में उद्घाटन, शिलान्यास और घोषणाओं की खबरें मुख्य पृष्ठ की शोभा बढ़ा रही हैं। अखबार के मुताबिक 24 अगस्त को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लगभग 1000 करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास किया है।
वहीं 23 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गंगा ब्रिज का उद्घाटन के साथ बिहार में 13,000 करोड़ रुपये से अधिक की विकास परियोजनाओं की शुरुआत भी की। यह सिलसिला पिछले एक से दो महीनों से जारी है
बिहार में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहने का रिकॉर्ड बना चुके नीतीश मुख्यमंत्री पद पर दहाई यानी 10वीं बार शपथ लेने के लिए जोर लगा रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महिला सशक्तिकरण से लेकर बुनियादी ढांचे के विकास तक हर क्षेत्र में नई योजनाओं की घोषणा एवं शुरुआत की जा रही है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये घोषणाएं असली विकास का हिस्सा हैं या फिर ये सब कुछ चुनावी रणनीति का हिस्सा है?
पिछले 3-4 महीनों में लिए गए महत्वपूर्ण फैसले

बिहार सरकार के द्वारा बिहार से बाहर रह रहे प्रवासियों के लिए 105.82 करोड़ रुपए की लागत से 75 एसी एवं 74 डीलक्स व लोक निजी भागीदारी से 150 अतिरिक्त एसी बसों एवं 299 एसी एवं नॉन एसी बसों का परिचालन किया गया है।
केंद्र सरकार की सहायता से स्पेशल ट्रेन चलाने की भी योजना है। केंद्र सरकार ने बिहार में रेलवे के विकास के लिए 86107 करोड़ रुपये की 52 परियोजनाओं को मंजूरी दी है।
राज्य के घरेलू विद्युत उपभोक्ताओं को 125 यूनिट बिजली निशुल्क कर दिया गया है। अगले 3 वर्षों में घरेलू उपभोक्ताओं के घरों की छत/सार्वजनिक स्थलों पर सौर ऊर्जा संयंत्र का अधिष्ठापन की शुरुआत भी की गई है।
माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने कुल 6,51,602 बाढ़ प्रभावित परिवारों के बैंक खातों में ₹7,000 प्रति परिवार की दर से ₹456 करोड़ 12 लाख की राशि DBT के माध्यम से हस्तांतरित की है। इसे चुनावी प्रचार के तौर पर एनडीए पार्टी के द्वारा प्रचारित किया जा रहा है।
बिहार सरकार के द्वारा विद्यालय रसोइयों का मानदेय ₹1600 से बढ़ाकर ₹3,300 प्रतिमाह, स्कूलों के नाइट गार्ड का मानदेय ₹5,000 से बढ़ाकर ₹10,000 प्रतिमाह, शारीरिक शिक्षक व स्वास्थ्य अनुदेशकों को ₹8,000 से बढ़ाकर ₹16,000 प्रतिमाह, बीएलओ वार्षिक पारिश्रमिक ₹10,000 से बढ़ाकर ₹14,000, बीएलओ सुपरवाइजर वार्षिक पारिश्रमिक ₹15,000 से बढ़ाकर ₹18,000 की गई है।
युवाओं को सशक्त बनाने के लिए बिहार युवा आयोग का गठन करने का फैसला लिया है। आयोग राज्य के निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दिलाने वाली नीतियों के पालन की निगरानी करेगा। आयोग युवाओं को नशे और कुरीतियों से बचाने के लिए सरकार को ठोस सिफारिशें देगा। आयोग में एक अध्यक्ष, दो उपाध्यक्ष और सात सदस्य होंगे, जिनकी अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष तय की गई है।
युवाओं के लिए भी सरकार ने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। अगले 5 वर्षों में 1 करोड़ से अधिक रोजगार एवं नौकरियां देने का लक्ष्य रखा गया है। टीआरई-4 शिक्षक भर्ती परीक्षा में डोमिसाइल नीति लागू की गई है। BIADA एमनेस्टी पॉलिसी एवं बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन पैकेज 2025 से औद्योगिकीकरण और रोजगार को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं।
दिव्यांगजनों के लिए सिविल सेवा प्रोत्साहन योजना के तहत बीपीएससी एवं यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा पास करने पर क्रमशः ₹50 हजार एवं ₹1 लाख देने का प्रावधान किया गया है। मुख्यमंत्री प्रतिज्ञा योजना के तहत युवाओं को इंटर्नशिप के लिए ₹4,000 से ₹6,000 प्रतिमाह किया गया है।
सभी प्रकार के सरकारी नौकरियों की प्रारंभिक परीक्षा शुल्क ₹100 तथा मुख्य परीक्षा निःशुल्क कर दिया गया है। गिग कामगारों को दुर्घटना से मृत्यु पर ₹4 लाख की सहायता एवं विकलांगता पर ₹2.5 लाख एवं इलाज हेतु ₹16,000 तक की सहायता की गई है।
महिलाएं नीतीश कुमार का कोर वोटर हैं। बिहार सरकार ने इसके लिए भी कई फैसले लिए हैं। सभी सरकारी नौकरियों में बिहार की मूल निवासी महिलाओं को 35% आरक्षण की व्यवस्था की गई है। मुख्यमंत्री कन्या विवाह मंडप योजना से सभी 8,053 ग्राम पंचायतों में मैरिज हॉल निर्माण के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत को ₹50 लाख की राशि स्वीकृत की गई है।
1.40 लाख जीविका कर्मियों का मानदेय दोगुना एवं ₹3 लाख से अधिक बैंक ऋण पर ब्याज दर 10% से घटकर 7% कर दिया गया है। आशा एवं ममता कार्यकर्ताओं का मानदेय ₹1,000 से बढ़ाकर ₹3,000, आंगनबाड़ी सेविकाओं को मोबाइल खरीदने के लिए ₹11,000 सहायता एवं ममता कार्यकर्ताओं का मानदेय प्रति प्रसव ₹300 से बढ़ाकर ₹600 कर दिया गया है।
बिहार सरकार ने कई अन्य महत्वपूर्ण फैसले भी लिए हैं। निजी बस ऑपरेटरों को नई बस खरीदने पर ₹20 लाख की सब्सिडी, पत्रकार पेंशन ₹6,000 से बढ़ाकर ₹15,000 प्रतिमाह, मुख्यमंत्री कलाकार पेंशन योजना के तहत ₹3,000 प्रतिमाह, जे.पी. सेनानी पेंशन ₹7,500 से ₹15,000 व ₹15,000 से ₹30,000, किसान सलाहकार का मानदेय ₹13,000 से बढ़ाकर ₹21,000 प्रतिमाह एवं मुख्यमंत्री गुरु-शिष्य परंपरा योजना के तहत गुरुजी को ₹15,000, संगतकार को ₹7,500 और शिष्य को ₹3,000 प्रतिमाह किया गया है।
प्रयास सिर्फ चुनावी योजना
पिछले 20 वर्षों में नीतीश कुमार ने बिहार में रोजगार के लिए क्या किया? आंकड़ों के मुताबिक बिहार में बेरोजगारी दर के कम होने की गति बहुत धीमी है। आर्थिक सर्वेक्षण के रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में पुरुषों में बेरोजगारी दर 3.3 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों के पुरुषों में बेरोजगारी दर 6.9 प्रतिशत है।
गांव और शहरों को मिलाकर देखें तो पुरुषों की बेरोजगारी दर 3.6 प्रतिशत और महिलाओं की दर 1.4 प्रतिशत है। देश में औसत बेरोजगारी 3.2 फीसदी है। यानी बिहार में बेरोजगारी देश के औसत से अधिक है।
वहीं राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव लगातार दावा कर रहे हैं कि उनके उपमुख्यमंत्री रहते हुए ही बिहार में पांच लाख युवाओं को रोजगार दिया गया। कुछ दिन पहले राजद ने पांच मार्च को युवा संसद का आयोजन किया था। इसमें तेजस्वी यादव ने घोषणा की थी कि उनकी पार्टी की सरकार बनते ही एक महीने के भीतर युवा आयोग का गठन किया जाएगा। जिसे कुछ दिन पहले नीतीश सरकार ने करने की घोषणा की है।
प्रसिद्ध ब्लॉगर एवं लेखक रंजन ऋतुराज कहते हैं कि, “बिहार को ट्रेन नहीं उद्योग और रोजगार चाहिए। यह कितनी भावनात्मक अपील है, लेकिन हमारे राजनेताओं को लगता है कि अगर बिहार को होली, छठ, ईद, दीपावली में कुछ ट्रेन दे देंगे तो बदले में वोट मिल जाएगा। दिक्कत हम में है, हम मानसिक रूप से गरीब हैं।
इस मानसिक गरीबी का उपाय कीजिए वरना आने वाली पीढ़ी कभी माफ नहीं करेगी। बस एक छोटा सा सवाल है कि राजधानी पटना में स्नैक्स मिलता है। वह चिउड़ा का भूंजा गुड़गांव और फरीदाबाद की जगह हाजीपुर और फतुहा में क्यों नहीं बन सकता?” आंकड़ों के मुताबिक 7 करोड़ की आबादी वाले गुजरात को रेल इंफ्रास्ट्रक्चर के 17 हजार करोड़ और 14 करोड़ आबादी वाले बिहार को मात्र 10 हजार करोड़ दिया गया है।
सरकारी योजना अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचती

“बिहार में सरकारी लाभ लेना काफी मुश्किल है। प्रवासी मजदूर के दुर्घटना होने पर लाभ का प्रावधान है। सांप काटने पर लाभ का प्रावधान है। बिजली गिरने पर मृत्यु होने पर लाभ का प्रावधान है। इस लाभ को लेने के लिए सरकार कितना प्रचार प्रसार कर रही है। आम लोगों को पता तक नहीं है।” जेएनयू में पढ़ाई कर रहे बिहार के सत्यम बताते हैं।
पटना में जनरल कंपटीशन की तैयारी कर रहे रोहतास के सौरभ दुबे बताते हैं कि, “सरकार नौकरी देने का वादा कर रही है। अच्छी बात है, लेकिन पेपर लीक का मामला सब कुछ फीका कर दे रहा है। बिहार में पेपर लीक का मामला एक गंभीर चुनौती है। सब कुछ छात्र छात्राओं का दांव पर लग जाता है। ऐसे में सरकार को इस पर कुछ नया सोचने की जरूरत है।”
पटना के सुनील महतो पेशे से व्यवसायी हैं। वह बताते हैं कि, “सरकार की ओर से सब प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर पहुंचने में समय लग जाता है। ऐसे में चाहिए कि जो योजनाएं चल रही हैं, उसको समय पर धरातल पर उतारा जाए। कई बार ऐसा होता है कि सरकार का वादा सिर्फ बातों में ही रह जाता है। यदि ऐसा होता है तो यह बहुत ही अच्छा होगा।”
20 साल के मुख्यमंत्री रहने के बाद बिहार कहां?
इन सरकारी घोषणाओं पर पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव कहते हैं कि, “स्पष्ट है कि 20 वर्षों की इस नकलची एनडीए सरकार की अपनी कोई नीति, दृष्टि और विजन नहीं है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन, बिजली की फ्री यूनिट, सरकारी नौकरी, रसोइयों, रात्रि प्रहरियों तथा शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य अनुदेशकों, आशा एवं ममता कार्यकर्ताओं के मानदेय में वृद्धि, युवा आयोग का गठन अथवा एक करोड़ रोजगार का विषय हो।
20 सालों की इस थकी-हारी कालग्रस्त सरकार ने हमारी हर घोषणा, योजना, दृष्टि एवं मांग की नकल कर चुनावी वर्ष में आनन-फानन में ये घोषणा की है। विपक्ष से इनका ये डर अच्छा है।”
इस बार एनडीए सरकार मुख्य स्लोगन के रूप में लिख रही है कि, “रफ्तार पकड़ चुका बिहार” यानी 20 वर्ष एनडीए के शासन के रहने के बावजूद भी विकास की रफ्तार पकड़ने के दौर में ही है। बिहार कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता धीरेन्द्र झा कहते हैं कि, “प्रति व्यक्ति आय के मामले में बिहार 33वें स्थान पर है।
भारत के नियंत्रक व महालेखा परीक्षक की ताजा रिपोर्ट ने बिहार की फाइनेंशियल स्थिति की परतें खोल दी हैं। रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2024 तक बिहार सरकार ने 70,877.61 करोड़ रुपये खर्च कर डाले, लेकिन इन पैसों का इस्तेमाल कहां और कैसे हुआ, इसका कोई हिसाब नहीं दिया गया। आज भी हम अन्य राज्यों से ट्रेन के माध्यम को सौगात समझते हैं। 20 साल के मुख्यमंत्री रहने के बाद भी बिहार वहीं का वहीं है।”
बीएनएमयू यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ से जुड़े मोहित झा बताते हैं कि, “पूरा तंत्र अराजकता के हवाले है! अफसरशाही पूरी तरह हावी है। NH और SH की चौड़ीकरण के कारण बिहार में दलित–गरीबों की बस्तियां बुल्डोजर के जरिए रौंदी जा रही हैं।”
मिथिला स्टूडेंट यूनियन से जुड़े अभिषेक बताते हैं कि, “एसआईआर में गड़बड़ी हुई है, फिर भी इस मुद्दे से एनडीए को हराया नहीं जा सकता है। बिहार में अपराधियों पर लगाम लगाना यानी ‘जंगलराज’ को खत्म करना कभी नीतीश कुमार की सबसे बड़ी उपलब्धि हुआ करती थी, लेकिन हाल की कुछ घटनाओं ने उनकी इस साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार में अपराध भी बढ़े हैं और पुलिस पर काम का दबाव भी। विपक्ष को इस मुद्दे को लेकर सरकार से सबसे अधिक सवाल पूछना चाहिए।”
मुद्दा…जो जनता पर असर कर रहा
नीतीश कुमार के द्वारा किए गए कुछ घोषणाओं का असर सीधे जनता पर पड़ रहा है। जिसमें खासकर विधवा, वृद्धजन और दिव्यांगों का पेंशन और 125 यूनिट बिजली फ्री। बिहार के गांव में इन घोषणाओं का काफी असर है।
बक्सर जिला के 50 वर्षीय हरिशंकर तिवारी बताते हैं कि, “अभी भी बिहार में ₹1200 महीना बहुत कुछ होता है। यहां प्रति व्यक्ति आय इतनी कम है कि.. यहां का मुद्दा उद्योग नहीं रोटी है। सरकार का यह घोषणा जमीन पर काफी काम करेगी।”
वहीं राज्य के वरिष्ठ पत्रकार राजेश ठाकुर बताते हैं कि, “बिहार के करीब सौ जातियों का समूह है, जिसे नीतीश कुमार ने साधकर ना केवल एकजुट किया बल्कि बीते 14 सालों से बिहार की सत्ता पर इनकी मदद से काबिज रहे। आगे भी यही समीकरण चुनावी राजनीति को बदलेगा। बिहार में जातीय समीकरण ही सत्ता का समीकरण तय करता है।”