नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने 2,000 रुपये से अधिक के UPI पेमेंट पर 0.4 प्रतिशत MDR (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) लगाने की व्यवस्था पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। साथ ही केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) को नोटिस जारी किया है। सोमवार (28 सितंबर) को जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने यह आदेश दिया। कोर्ट ने तीनों पक्षों से चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है।
क्या है मामला?
16 सितंबर को जारी अधिसूचना के तहत 2,000 रुपये से ऊपर के UPI लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत MDR लगाने का प्रावधान किया गया है। अंजन दत्ता नाम के याचिकाकर्ता ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह व्यवस्था बिना पर्याप्त चर्चा और कानूनी प्रक्रिया के लाई गई है। इससे छोटे व्यापारियों पर बोझ बढ़ेगा और लोग दोबारा नकद भुगतान की ओर रुख कर सकते हैं।
कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि UPI आने के बाद काले धन के लेन-देन में कमी आई है। अतिरिक्त शुल्क लगाने से डिजिटल अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंच सकता है। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने सरकार का पक्ष रखते हुए बताया कि यह व्यवस्था अभी पूरी तरह लागू नहीं हुई है।
15 अक्टूबर पहला चरण है। गेटवे का इस्तेमाल करने वाले 96 प्रतिशत लोगों को छूट मिली हुई है। उन्होंने कहा कि डेबिट-क्रेडिट कार्ड की तरह UPI में भी लागत आती है। यह सरकार की वसूली नहीं, बल्कि ऑपरेटर्स के बीच सेटलमेंट फीस है कोर्ट ने पूछा कि इस तरह की वसूली का स्वरूप क्या है। अगर यह फीस होती तो समझ में आता, लेकिन इसका कानूनी आधार क्या है।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई रोक नहीं लगाई है। केंद्र, RBI और NPCI को चार हफ्ते में अपना जवाब देना है। इसके बाद कोर्ट मामले की आगे सुनवाई करेगा। यह मामला डिजिटल पेमेंट सिस्टम और छोटे व्यापारियों पर पड़ने वाले असर दोनों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।








