IDBI बैंक के निजीकरण का AIIEA ने किया विरोध, सरकार से फैसला वापस लेने की मांग

नई दिल्ली। ऑल इंडिया इंश्योरेंस एम्प्लॉइज एसोसिएशन (AIIEA) ने आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) में सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की बहुमत हिस्सेदारी बेचने के फैसले का कड़ा विरोध किया है। संगठन ने सरकार से बैंक के निजीकरण का प्रस्ताव रद्द करने की मांग की है। AIIEA का कहना है कि लगातार मुनाफा कमा रहे बैंक का नियंत्रण किसी विदेशी कंपनी को सौंपना सार्वजनिक क्षेत्र और आम ग्राहकों के हित में नहीं है।

52,878 करोड़ रुपये में 60.72% हिस्सेदारी बेचने का दावा

AIIEA के अध्यक्ष धर्मराज महापात्र और महासचिव श्रीकांत मिश्रा ने संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (CCEA) ने सरकार और LIC की संयुक्त 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को 52,878 करोड़ रुपये में बेचने का फैसला किया है।

संगठन के मुताबिक, इसमें केंद्र सरकार की 30.48 प्रतिशत और LIC की 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी शामिल है। बिक्री के बाद बैंक में सरकार की हिस्सेदारी घटकर 15 प्रतिशत और LIC की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत रह जाएगी।

संसद में दिए पुराने आश्वासन पर उठाए सवाल

संगठन ने कहा कि आईडीबीआई बैंक की वित्तीय स्थिति लगातार बेहतर हुई है और बैंक मुनाफे में चल रहा है। ऐसे में निजीकरण की जरूरत पर सवाल उठते हैं।

AIIEA ने वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री की ओर से संसद में दिए गए आश्वासन का भी जिक्र किया। संगठन के अनुसार, उस समय सरकार ने आईडीबीआई में कम से कम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखने की बात कही थी। संगठन का आरोप है कि मौजूदा फैसला उस आश्वासन के विपरीत है।

विनिवेश लक्ष्य पूरा करने के लिए बिक्री का आरोप

AIIEA ने आरोप लगाया कि सरकार चालू वित्त वर्ष के 80 हजार करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य को पूरा करने के लिए बैंक की हिस्सेदारी बेच रही है। संगठन ने सवाल उठाया कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बैंक का नियंत्रण विदेशी वित्तीय संस्था को सौंपना सरकार के आर्थिक राष्ट्रवाद के दावों से कैसे मेल खाता है।

LIC की हिस्सेदारी घटाने की जरूरत नहीं : AIIEA

संगठन का कहना है कि LIC बैंक में प्रमुख शेयरधारक बनी रह सकती थी। इससे दोनों संस्थानों की साझेदारी मजबूत होती और बैंकिंग के साथ बीमा सेवाओं का विस्तार करने के नए अवसर मिलते।

AIIEA ने आशंका जताई कि सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों के निजीकरण का असर कर्मचारियों, ग्राहकों और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

संगठन ने आईडीबीआई बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों के विरोध का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार से निजीकरण का प्रस्ताव वापस लेने की मांग की है।

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