राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने प्रधानमंत्री मोदी के 75 साल में रिटायर होने की चर्चाओं पर विराम लगा दिया है, जिसे खुद उन्होंने ही महीने भर पहले संघ के दिवंगत विचारक मोरोपंत पिंगले के संस्मरणों की किताब के विमोचन के मौके पर छेड़ा था। इसके लिए उन्होंने मौका चुना, ‘सौ वर्ष की संघ यात्रा’ विषय पर नागपुर में हुए कार्यक्रम का।
खुद भागवत भी अगले महीने 75 बरस के हो रहे हैं और अब चूंकि उन्होंने साफ कर दिया है कि वह कहीं नहीं जा रहे हैं, तो यह संदेश संघ परिवार और उसके बाहर दोनों जगहों के लिए है। आप उनकी मासूमियत पर हैरान हो सकते हैं, जैसा कि उन्होंने कहा कि मोरोपंत जी मजाकिया स्वभाव के थे, और उन्होंने तो बस उनसे जुड़ा एक संस्मरण दोहराया था! यदि इसे संघ और भाजपा के बीच सुलह समझा जा रहा है, तो यह भोलापन ही है।
आखिर भाजपा और संघ दोनों अलग कब थे! वैसे भागवत ने यह भी कहा है कि संघ भाजपा के फैसले नहीं लेता, यदि ऐसा होता तो भाजपा को अपना अध्यक्ष चुनने में इतनी देर नहीं होती। भाजपा का नया अध्यक्ष चुनने में हो रही देरी की वजहें जो भी हों, लेकिन जनसंघ के जमाने से भाजपा को संघ की राजनीतिक इकाई के रूप में ही देखा जाता है, और इसे लेकर कभी कोई भ्रम नहीं रहा है।
वास्तव में इस कार्यक्रम में मोहन भागवत ने संघ और भाजपा के रिश्तों के साथ ही बहुत विस्तार से मुस्लिमों, ईसाइयों और अखंड भारत के बारे में बात की है, बेशक इसमें नया कुछ नहीं है। भागवत ने कहा है कि देश में जिस दिन से इस्लाम आया है, तबसे वह यहां है और आगे भी रहेगा।
फिर इसके साथ ही वह जनसांख्यिकी परिवर्तन की बात करते हुए कहते हैं कि हर भारतीय को तीन बच्चे पैदा करना चाहिए, जिसमें छिपे संदेश साफ हैं। वैसे यह कोई छिपी बात नहीं है कि आरएसएस और उसके आनुषांगिक संगठन बढ़ती आबादी और जनसांख्यिकी परिवर्तन को लेकर कैसे मुस्लिमों को निशाना बनाते रहे हैं।
भागवत ने कहा, ‘जन्मदर (टीएफआर) गिरकर 2,1 हो गई है और डॉक्टरों का कहना है कि जिस समुदाय की जन्मदर तीन से नीचे जाती है, वह विलुप्त हो जाती है’।
मोदी सरकार ने 2021 की जनगणना टाल दी थी, तो जनसंख्या और जन्मदर के जो आंकड़ें हैं, वह तो 2011 की जनगणना के हैं, या फिर एनएफएचएस-5 (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण) के हैं, जिसे 2019-21 के बीच अंजाम दिया गया।
एनएफएएचएस-5 के मुताबिक 1992-93 से लेकर 2019-21 के बीच मुस्लिमों में टीएफआर (प्रजनन दर) में 46.5 फीसदी की गिरावट आई, जबकि हिन्दुओं में यह दर 41.2 फीसदी थी।
जाहिर है, तर्कों और तथ्यों की कसौटी पर तो जनसांख्यिकी परिवर्तन के दावे कहीं नहीं ठहरते, लेकिन इसे जिस तरह से मुद्दा बनाया जा रहा है, वह संवैधानिक रूप से भी गलत है।
यह भी समझने की जरूरत है कि जनसांख्यिकी परिवर्तन के साथ ही धर्मांतरण को लेकर ईसाइयों को निशाना बनाया जा रहा है, वह भी संघ की वृहत योजना का हिस्सा ही है, लेकिन यदि एनएफएचएस-5 के ही आंकड़ों को देखें, तो ईसाइयों में प्रजनन दर 1.9 से घटकर 1.88 रह गई है।
भागवत कहते हैं कि सारे भारतीयों का डीएनए एक है, तो फिर सवाल यही है कि मुस्लिमों और ईसाइयों के साथ ‘दूसरों’ जैसा व्यवहार क्यों? यह विडंबना ही है कि ऐसी हो रहा है, और यह सत्ता के शिखर से हो रहा है।