नई दिल्ली। एक चौंकाने वाले खुलासे में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन बी. लोकुर ने खुलासा किया है कि केंद्र सरकार ने जस्टिस एस. मुरलीधर के एक फैसले के कारण उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से ट्रांसफर करने के लिए कॉलेजियम पर बार-बार दबाव डाला था, लेकिन तब तक यह कदम नहीं उठाया गया, जब तक कि ट्रांसफर का विरोध करने वाले प्रमुख जज रिटायर नहीं हो गए।
हाल ही में प्रकाशित पुस्तक “पूर्ण न्याय: कोर्ट के 75 वर्ष” में अपने निबंध में जस्टिस लोकुर ने बताया कि कॉलेजियम में उनके कार्यकाल के दौरान, सरकार ने जस्टिस मुरलीधर के तबादले का आग्रह किया था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि उन्होंने इसका विरोध किया था।
कॉलेजियम की कार्यवाही पर उठे सवाल
न्यायिक स्वतंत्रता बचाने के दावे पर संदेह लोकुर के अनुसार, दिसंबर 2018 में उनकी रिटायरमेंट के बाद यह मांग फिर से उठी। उस समय जस्टिस ए.के. सीकरी ही इस प्रस्ताव के खिलाफ थे।
मार्च, 2019 में जस्टिस सीकरी के रिटायरमेंट के बाद तबादले का प्रस्ताव फिर से उठाया गया। अंततः, जस्टिस मुरलीधर का फरवरी, 2020 में दिल्ली हाईकोर्ट से “मनमाने ढंग से” तबादला कर दिया गया।
लोकुर ने लिखा, ‘सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता के बारे में कुछ कहा जाना चाहिए। एक अवसर पर मुझे स्पष्ट रूप से यह आभास हुआ कि कार्यपालिका द्वारा चीफ जस्टिस को एक तबादला करने की सलाह दी गई थी।’
उन्होंने आगे लिखा, ‘जस्टिस मुरलीधर का उनके द्वारा दिए गए एक फैसले के लिए दिल्ली हाईकोर्ट से तबादला चौंकाने वाला था। मेरे विचार से यह निश्चित रूप से तबादले का आधार नहीं हो सकता। इसलिए मैंने प्रस्ताव पर अपनी असहमति व्यक्त की।’
वे आगे लिखते हैं, ‘चीफ जस्टिस ने मेरे विचार को सहर्ष स्वीकार कर लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया से मेरे रिटायर होने के बाद तबादले का मुद्दा फिर से उठाया गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में नए सदस्य जस्टिस सीकरी का भी यही विचार था।’
जस्टिस लोकुर ने लिखा – ‘उन्होंने भी प्रस्तावित तबादले का विरोध किया। जस्टिस सीकरी के रिटायरमेंट के बाद जस्टिस मुरलीधर का मनमाने ढंग से दिल्ली हाईकोर्ट से पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में तबादला कर दिया गया।’
दिल्ली दंगों की मुरलीधर कर रहे थे सुनवाई
इस फैसले ने उस समय काफी विवाद खड़ा कर दिया था। यह तबादला आदेश 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान भड़काऊ भाषण देने के आरोपी राजनेताओं के खिलाफ FIR दर्ज न करने के लिए दिल्ली पुलिस की खिंचाई करने के कुछ ही घंटों बाद जारी किया गया था।
हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस ओक ने कहा कि जस्टिस मुरलीधर को दिल्ली दंगों के मामले में अपने साहसिक आदेशों के परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।