नई दिल्ली। भारत ने ईरान में दशकों से चल रही चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) परियोजना पर अमेरिका द्वारा लगाए गए कठोर प्रतिबंधों के कारण रणनीतिक रूप से पीछे हटने का निर्णय लिया है। इस निर्णय से भारत की मध्य एशिया, अफगानिस्तान और यूरोप तक पहुंच बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजना पर भारी प्रभाव पड़ा है।
अमेरिकी प्रशासन ने सितंबर 2025 से चाबहार पोर्ट पर दी गई प्रतिबंधों से छूट को वापस ले लिया था जिससे इस प्रोजेक्ट पर काम करना मुश्किल हो गया। भारत ने इससे पहले ही लगभग 120 मिलियन डॉलर का भुगतान ईरान को पूरा कर दिया है, ताकि किसी वित्तीय दायित्व का भार भारत पर न रहे।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, India Ports Global Ltd (IPGL) जो चाबहार पोर्ट के संचालन के लिए बनाया गया था, ने अपने भारत स्थित निदेशकों को बोर्ड से हटा दिया है और अपनी वेबसाइट भी बंद कर दी है ताकि संभावित संयुक्त राज्य के दंडात्मक कार्रवाई के जोखिम से बचा जा सके।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि अमेरिका फिर से प्रतिबंध हटाता है या नीतिगत ढील देता है, तो भारत फिर से इस परियोजना में शामिल होने पर विचार करेगा फिलहाल भारत ने वहां से सक्रिय भूमिका कम कर दी है। हालाँकि अमेरिका ने अभी हाल ही में छह महीने की अस्थायी छूट भी प्रदान की है, जिसके तहत कुछ समय के लिए प्रतिबंध लागू नहीं होंगे और भारत को पोर्ट से जुड़ी गतिविधियों को बंद करने की प्रक्रिया पूरी करने का समय मिला है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि यह छूट अप्रैल 2026 तक के लिए मान्य है।
चाबहार पोर्ट का भारत के लिए रणनीतिक महत्व अत्यधिक माना जाता है क्योंकि यह पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक समुद्री पहुंच प्रदान करता है, और अंतर्राष्ट्रीय नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का एक अहम हिस्सा है।
विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका-ईरान एवं भारत के बीच जटिल राजनयिक माहौल, ईरान में राजनीतिक अस्थिरता और अमेरिकी प्रतिबंधों की नीतियाँ चाबहार परियोजना को पुनर्परिभाषित कर रही हैं। इस स्थिति में भारत की आगे की रणनीति अमेरिका और ईरान दोनों के रुख पर निर्भर करेगी।










