अनूपपुर। मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (IGNTU), अमरकंटक में मॉडल ट्राइबल स्कूल को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब लगातार आठवें दिन भी जारी है। तेज बारिश के बीच भी सैकड़ों आदिवासी परिवार, छात्र-छात्राएं और बुजुर्ग विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर डटे हुए हैं। एक स्कूल से जुड़ा यह विवाद अब शिक्षा, आदिवासी अधिकार और विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
प्रदर्शनकारियों ने सोमवार को विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार को जाम कर दिया, जिससे विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियां भी प्रभावित हुईं। पोस्ट ग्रेजुएशन काउंसलिंग के लिए देश के अलग-अलग राज्यों से पहुंचे कई अभ्यर्थी परिसर में प्रवेश नहीं कर सके और घंटों बारिश में इंतजार करते रहे।
पूरा विवाद यूनिवर्सिटी कैंपस में संचालित मॉडल ट्राइबल स्कूल को लेकर है। वर्तमान में यहां केवल पहली से आठवीं तक पढ़ाई होती है, जबकि नौवीं से बारहवीं तक की कक्षाएं शुरू नहीं की गई हैं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि हर वर्ष आठवीं के बाद सैकड़ों आदिवासी विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है। आसपास सीबीएसई बोर्ड का कोई सरकारी विकल्प नहीं है और निजी स्कूलों की फीस अधिकांश परिवारों की आर्थिक क्षमता से बाहर है। ऐसे में कई छात्र मजबूरी में पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं।
अभिभावकों का कहना है कि स्कूल में 350 से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं और यदि इस सत्र से 9वीं की कक्षाएं शुरू नहीं हुईं तो इन बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाएगा।
वर्षों से उठ रही मांग, समाधान अब भी नहीं
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह मांग वर्षों पुरानी है। ज्ञापन, आवेदन, जनप्रतिनिधियों के माध्यम से प्रयास और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय तक गुहार लगाने के बावजूद अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।
धरने पर बैठे अभिभावकों ने साफ कर दिया है कि जब तक 9वीं से 12वीं तक कक्षाएं शुरू करने का लिखित आश्वासन नहीं मिलता, आंदोलन जारी रहेगा।
‘पहली से 12वीं तक स्कूल‘ के दावे पर विवाद
प्रदर्शनकारी महेश सिंह ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मॉडल ट्राइबल स्कूल से जुड़े दस्तावेजों में पहली से बारहवीं तक कक्षाएं संचालित करने का उल्लेख किया गया था, लेकिन अब विश्वविद्यालय उस व्यवस्था को लागू नहीं कर रहा।
उनका कहना है कि इससे आदिवासी विद्यार्थियों का भविष्य अनिश्चितता में डाल दिया गया है।
छात्रा बोली– निजी स्कूल की फीस भरना संभव नहीं
धरने में शामिल एक छात्रा ने कहा कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, लेकिन अब तक आगे की पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं हुई। उसने कहा कि क्षेत्र में सीबीएसई बोर्ड का दूसरा स्कूल नहीं है और निजी स्कूलों की फीस इतनी अधिक है कि गरीब परिवार उसे वहन नहीं कर सकते।
आंदोलन का असर विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया पर भी पड़ा। पोस्ट ग्रेजुएशन काउंसलिंग के लिए हजारों किलोमीटर दूर से पहुंचे विद्यार्थियों को मुख्य द्वार बंद होने के कारण परिसर में प्रवेश नहीं मिला। कई छात्रों ने बताया कि उन्हें बारिश में घंटों इंतजार करना पड़ा और ठहरने की भी समुचित व्यवस्था नहीं थी।
बातचीत बेनतीजा, गतिरोध बरकरार
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अधिकारियों का एक दल आंदोलनकारियों से बातचीत करने पहुंचा, लेकिन कोई सहमति नहीं बन सकी।
आठ दिनों से जारी यह आंदोलन अब केवल एक स्कूल में कक्षाएं बढ़ाने की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। यह आदिवासी क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उपलब्धता, उच्च शिक्षा संस्थानों की सामाजिक जिम्मेदारी और शिक्षा तक समान पहुंच जैसे सवालों को भी केंद्र में ले आया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और केंद्र सरकार इस गतिरोध को खत्म करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।











