सावधान, आगे अडाणी टोल गेट है!

जहां जाइएगा, हमें पाइएगा! भारत के विकास के हर कदम पर अडाणी के टोल गेट (Adani Toll Gate) बने हैं। हवाई अड्डे पर, किसी भी माल को मंगाने पर अडाणी जैसों की कमाई का अजब खेल चल रहा है। ऐसा लगता है मानो जगह-जगह अडाणी जी खड़े हैं और खुद टोल की पर्चियां काट रहे हैं। कल्पना कीजिए कि आपको मुंबई जैसे किसी एयरपोर्ट पर रोक लिया जाए और कहा जाए कि यहाँ आने का टोल 500 रुपये दीजिए। आप कहोगे कि मैंने हवाई जहाज का टिकट लिया है तो आपको टोल क्यों दूँ? या फिर आपने किसी दूसरे देश से माल मंगवाया और बंदरगाह पर कहा जाए कि इसका टोल देना पड़ेगा तभी यहाँ से माल छुड़वाया जा सकता है।

है न अटपटी बात? आपसे यह टोल लिया जा रहा है और आप दे रहे हो। चूँ तक नहीं कर पा रहे। अडाणी समूह के ऐसे अदृश्य और दृश्यमान टोल गेट जगह-जगह बने हैं। बाकायदा वसूली हो रही है। आपको मुंबई से फ्लाइट पकड़नी हो तो 800 से 1000 रुपये किसी न किसी रूप में अडाणी को पे करना ही होता है। इसे नाम दिया गया है – यूज़र डेवलपमेंट फीस, एविएशन सिक्योरिटी फीस, तरह-तरह के सरचार्ज! ये सब आपके हवाई टिकट के माध्यम से वसूला जाता है। डोमेस्टिक पैसेंजर से थोड़ा कम, परदेस जाने वालों से ज्यादा। आओ तो भी देना पड़ता है, जाओ तो भी लगता है! किसको जाता है यह शुल्क और सरचार्ज? एयरपोर्ट के मालिक को। और मालिक कौन है?

ग़ज़ब का खेला किया गया है। अडाणी और कुछ घरानों ने देश की इकॉनमी के साथ खुद को ऐसी शानदार चतुराई से सिंक्रोनाइज़ किया है कि कोई भी सरकार आ जाए, उनका बाल बांका नहीं होगा। इतना ही नहीं, जैसे-जैसे इकॉनमी ग्रो करेगी, उनकी कमाई भी बढ़ती ही रहेगी। इधर देश की जीडीपी बढ़ी, उधर सेठ जी की दौलत बढ़ी!

भारत भर में आप किसी भी हाईवे पर जाइए – हर पच्चीस या तीस किलोमीटर पर ऐसे बोर्ड नज़र आते हैं जिन पर लिखा होता है – आगे टोल बूथ है। ऐसे रोड से गुजरने के लिए टोल फीस देनी पड़ती है। यह टोल शुल्क कहीं-कहीं तो ढाई रुपये प्रति किलोमीटर या उससे भी ज्यादा है! यह टोल एनएचएआई खुद या उसके ठेकेदार उसकी तरफ से वसूल करते हैं। सरकारी आंकड़ा है कि देश में करीब 26 करोड़ से ज्यादा वाहन हैं। यह संख्या हर साल 8 से 11 प्रतिशत बढ़ रही है। 2050 तक देश में 49 करोड़ वाहन होने का अनुमान है।

अब यह बात समझें कि अगर एक रोड पर आज 100,000 वाहन रोज 50 रुपये टोल देकर जा रहे हैं और दस साल बाद हर वाहन से 100 रुपये वसूला जाएगा तो टोल वालों की कमाई दोगुनी नहीं, तीन-चार गुना तक बढ़ सकेगी क्योंकि टोल का रेट भी बढ़ेगा और वाहनों की संख्या भी। है ना गजब का जादू! जब ज्यादा वाहन रोड से गुजरने वाले हैं तो हर साल टोल का रेट कम होना चाहिए या ज़्यादा? खेल यहीं पर है!

यहाँ दो मुख्य बातों पर ध्यान दीजिए: पहली बात तो यह कि टोल हर साल बढ़ता ही जाता है और कहीं-कहीं तो 30 साल तक के लिए बढ़ाने की अनुमति दी गई है। यानी आज टोल 50 रुपये है तो सालभर बाद 60 हो जाएगा और पांच साल बाद 100 रुपये! महंगाई से ज़्यादा टोल के रेट बढ़ रहे हैं। यानी टोल कम्पनी को ज़्यादा कमाई की गारंटी है। टोल लेने वालों के लिए दूसरी फायदे की बात यह है कि देश में हर साल वाहन भी बढ़ रहे हैं।

भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर (बंदरगाह, एयरपोर्ट, रोड, एनर्जी) के विकास पर अडाणी ग्रुप का बड़ा कंट्रोल है, और हर विकास/ट्रेड/ट्रैवल से उनकी कमाई (टोल जैसी फीस) होती है। जहाँ विकास, वहाँ अडाणी का हिस्सा; जहाँ कमाई, वहाँ अडाणी। चाहे सागरमाला प्रोजेक्ट हो या गति शक्ति, हवाई अड्डों का प्राइवेटाइजेशन हो या दूसरी सरकारी स्कीम्स, अडाणी बड़े प्लेयर हैं।

मुंबई का हवाई अड्डा अडाणी ग्रुप ने 2021 में हासिल किया था। तब डोमेस्टिक पैसेंजर से कोई यूज़र डेवलपमेंट फीस नहीं ली जाती थी। बाद में ली जाने लगी। अब अगर आप एयरपोर्ट से फ्लाइट पकड़ो तो फीस लगती है। आप अपने घर या मोहल्ले से तो हवाई जहाज में बैठ नहीं सकते, आओगे तो हवाई अड्डे पर ही। तो सेवा शुल्क दो। यही है अडाणी टोल! यह भी समय-समय पर बढ़ता जा रहा है। पहले 2021 में अंतरराष्ट्रीय पैसेंजर से 187 रुपये लेते थे, अब बढ़ाते-बढ़ाते 650 रुपये लेते हैं। फीस बढ़ी तो कमाई बढ़ी, यात्री बढ़े तो कमाई और भी मल्टीप्लाई होने लगी। ड्यूटी फ्री शॉप से कमाई, हवाई अड्डे की खानपान की दुकानों से कमाई, एयरपोर्ट को शॉपिंग मॉल बना दिया वहाँ से कमाई, शराब की दुकान से कमाई, पार्किंग से तगड़ी कमाई!

अडाणी समूह के बंदरगाहों को गेटकीपर बिजनेस भी कहा जा सकता है। अडाणी समूह के पास कुल 15 बंदरगाह या टर्मिनल हैं जो गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में हैं। देश का सबसे बड़ा निजी बंदरगाह मुंद्रा है। इसके अलावा हजीरा, दाहेज, कृष्णापट्टनम, धमरा, कट्टुपल्ली, गोपालपुर और विझिंजम अडाणी के पोर्ट हैं। भारत में जितनी भी कार्गो हैंडलिंग होती है, यानी बड़े-बड़े जहाजों में जितना भी माल आता है, उसका 24 से 28% अडाणी समूह के हाथ में है। भारत में अडाणी का कार्गो का वॉल्यूम पिछले 10 सालों में चार गुना बढ़ा है, जबकि सरकार के 12 बड़े बंदरगाहों का हिस्सा कम हो गया है। इस साल अडाणी समूह के बंदरगाहों ने 38,703 करोड़ रुपये की कमाई की। हर एक टन माल के आगमन पर अडाणी को 720 रुपये हैंडलिंग चार्जेस के रूप में मिले, यानी आपने हमारा बंदरगाह उपयोग किया तो उसका किराया दो। इसका मतलब यह है कि आप अगर कोई भी विदेशी सामान खरीदते हैं और वह जिस जहाज पर आया है, अगर वह अडाणी समूह के बंदरगाह पर उतरा है, तो एवरेज हर किलो सामान पर आपके 72 पैसे अडाणी को टोल के रूप में गए हैं।

यह अडाणी ग्रुप की मोनोपोली या ओलिगोपोली है कि उसकी हर हालत में चांदी ही चांदी है। देश का विकास तो होना ही है, जीडीपी बढ़नी ही बढ़नी है, माल का आयात-निर्यात बढ़ना ही है, और हर मौके की जगह पर, अडाणी ग्रुप ने टोल गेट बना रखे हैं। यही है टोल गेट कारोबार का स्टाइल!

  • लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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