हांफता-कांपता निजी क्षेत्र और मरियल होता सार्वजनिक सेक्टर

भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में एक समय बड़ी श्रद्धा से कहा जाता था कि सरकार चौकीदार बने, दुकानदार नहीं। सरकार नीतियां बनाए, व्यापार निजी क्षेत्र पर छोड़ दे। यह वाक्य धीरे-धीरे आर्थिक नीति का ऐसा मंत्र बन गया कि उसे प्रश्नों से लगभग मुक्त कर दिया गया।

लेकिन अब लगता है कि अर्थव्यवस्था भी कभी-कभी पुराने मुहावरे याद दिला देती है – नौ दिन चले अढ़ाई कोस।

भारत में निजी क्षेत्र की वृद्धि दर 10 महीने के निचले स्तर पर पहुँच गई है। वैसे बीमारी नई नहीं है। पिछले तीन साल से कमजोरी दिख रही थी, लेकिन अब मामला उस स्थिति तक पहुँच गया है जिसे लोग आम भाषा में कहते हैं कि पानी सिर से ऊपर निकल गया।

कारण भी किसी एक खिड़की से नहीं दिखते। नए ऑर्डर घटे हैं, मिडिल ईस्ट का तनाव वैश्विक अनिश्चितता बढ़ा रहा है, ऊर्जा कीमतें कभी ऊपर तो कभी नीचे झूला झूल रही हैं और घरेलू मांग वैसी नहीं दिख रही जो निवेशकों को नई फैक्टरी लगाने के लिए उत्साहित कर दे। कई क्षेत्रों में गतिविधि तीन साल के निचले स्तर तक पहुँच गई।

यह वही निजी क्षेत्र है जिसके बारे में कहा गया था कि यदि सरकार थोड़ा किनारे हो जाए तो यह ऐसी दौड़ लगाएगा कि विकास पीछे मुड़कर नहीं देखेगा।

ऐसा नहीं कि यह कहानी पूरी तरह गलत थी। 1991 के बाद भारत बदला। उद्यमिता बढ़ी, सर्विस सेक्टर ने छलांग लगाई, भारतीय कंपनियाँ दुनिया में पहचान बनाने लगीं। मध्यम वर्ग बढ़ा। अवसर बने। लेकिन हर कहानी की तरह इस कहानी में भी कुछ फुटनोट थे, जिन्हें हमने पढ़ने की जल्दी नहीं दिखाई।

हमने मान लिया कि सार्वजनिक क्षेत्र का समय समाप्त हो गया है। धीरे-धीरे सार्वजनिक क्षेत्र को ऐसे देखा जाने लगा जैसे वह घर का वह बुजुर्ग हो जिसे सम्मान तो दिया जाए, लेकिन फैसले उससे न पूछे जाएँ। सार्वजनिक संस्थाएँ बोझ कही गईं, सरकारी उद्योग अक्षम घोषित किए गए और यह विश्वास पैदा हुआ कि निजी क्षेत्र उनकी जगह अधिक कुशलता से भर देगा।

लेकिन अर्थव्यवस्था केवल नारे से नहीं चलती जैसे एक बैल से हल नहीं चलता।

आज सवाल यही है कि क्या हमने विकास की गाड़ी का एक बैल जल्दी खोल दिया और दूसरे से उम्मीद कर ली कि वह अकेला खेत जोत देगा?

सार्वजनिक क्षेत्र केवल नौकरी बाँटने की मशीन नहीं था। स्वतंत्रता के बाद जब निजी पूंजी सीमित थी, तब इसी क्षेत्र ने इस्पात कारखाने लगाए, बिजली परियोजनाएँ शुरू कीं, बैंक गाँवों तक पहुँचाए, सड़कें बनाईं, बंदरगाह बनाए और अनुसंधान संस्थाएँ खड़ी कीं। जिन रास्तों पर आज निजी क्षेत्र दौड़ रहा है, उनमें से कई सड़कें सार्वजनिक निवेश ने बनाई थीं।

इसका मतलब यह नहीं कि सार्वजनिक क्षेत्र में समस्याएँ नहीं थीं। थीं, और गंभीर थीं। राजनीतिक हस्तक्षेप, निर्णयों में सुस्ती, जवाबदेही की कमी और कई जगह अक्षम प्रबंधन। सुधार जरूरी थे।

लेकिन सुधार और धीरे-धीरे कमजोर करना अलग बातें हैं। अगर किसी खिलाड़ी को अभ्यास का अवसर न मिले, संसाधन न मिले, कोच बदलते रहें और फिर कहा जाए कि देखिए, यह अच्छा खेल नहीं रहा तो यह निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं कहलाता। इसीलिए आलोचक कहते हैं कि कई बार सुधार के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार नहीं किया गया, बल्कि मैदान ही छोटा कर दिया गया।

उधर निजी क्षेत्र भी किसी कविता का आदर्श नायक नहीं है। वह गोरख पांडे की कविता का अक्स है। उद्योगपति भावनाओं से नहीं, संकेतों से निवेश करते हैं। वे कर दर से अधिक मांग देखते हैं। वे शेयर बाजार से अधिक ग्राहक देखते हैं। वे भाषण से अधिक खरीद क्षमता देखते हैं। अगर लोगों की जेब हल्की है, रोजगार अस्थिर है और उपभोग दबाव में है तो पूंजी अक्सर इंतजार करती है।

यही कारण है कि शेयर बाजार की चमक और कारखानों की चिमनी का धुआँ हमेशा एक जैसी कहानी नहीं कहते। दुनिया के सफल देशों को देखिए—अमेरिका, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन। कहीं भी राज्य पूरी तरह गायब नहीं हुआ। सरकारें शिक्षा, तकनीक, शोध, रक्षा, अवसंरचना और औद्योगिक नीति में बनी रहीं। इंटरनेट से लेकर आधुनिक तकनीक तक की कई शुरुआती छलांगों में सार्वजनिक निवेश शामिल रहा।

इसलिए असली बहस “सरकार बनाम बाजार” नहीं है। असली सवाल है—कहाँ सरकार आगे रहे और कहाँ बाजार। भारत जैसे देश में, जहाँ करोड़ों लोगों की आय अभी भी सीमित है और क्षेत्रीय असमानताएँ गहरी हैं, वहाँ केवल बाजार आधारित विकास मॉडल सभी को साथ नहीं ले जा सकता।

समाधान क्या है?

नारे कम, संस्थाएँ अधिक।
घोषणाएँ कम, निवेश अधिक।
वैचारिक युद्ध कम, व्यावहारिक संतुलन अधिक।

सार्वजनिक निवेश को खर्च नहीं, भविष्य निर्माण माना जाए। एमएसएमई को फिर से केंद्र में लाया जाए। घरेलू मांग मजबूत की जाए। सार्वजनिक क्षेत्र का आधुनिकीकरण हो और निजी क्षेत्र को स्थिर व भरोसेमंद वातावरण मिले।

भारत की अर्थव्यवस्था इस समय चौराहे पर खड़ी है। अब यह मान लेना भी जल्दबाजी होगी कि निजी क्षेत्र अकेला सब संभाल लेगा, और यह मान लेना भी भूल होगी कि सरकार सब कुछ कर सकती है। अर्थव्यवस्था कोई सौ मीटर की दौड़ नहीं होती। यह लंबी यात्रा है और लंबी यात्राएँ दो पैरों से (सार्वजानिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र ) से ही होती हैं, एक पैर से नहीं !

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