भारत के दूरसंचार विभाग ने सभी स्मार्ट फोन निर्माताओं के लिए भारत में बेचे जाने वाले सारे मोबाइल फोन सेट में सरकारी साइबर सुरक्षा ऐप संचार साथी को इंस्टाल करना अनिवार्य कर दिया है, जिसे निजता और संविधान प्रदत्त व्यक्तिगत अधिकार के सीधे हनन के तौर पर देखा जा सकता है।
सरकार के इस विवादास्पद कदम कि जानकारी सामने आने के बाद संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की मीडिया में आधी-अधूरी सफाई है, जिसमें उन्होंने कहा है कि इस ऐप को उपभोक्ता चाहें तो हटा सकते हैं। उनका यह भी कहना है कि यह मोबाइल फोन उपयोग करने वाले पर है कि वह उसे एक्टिवेट करे या ना करे।
गौर किया जाना चाहिए कि अमेरिकी कंपनी एपल ने इस सर्कुलर को निजता के लिए खतरा बताते हुए उसे मानने से इनकार कर दिया है।
दरअसल सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि मोबाइल फोन कंपनियों को भेजे गए सर्कुलर के उपखंड 7 (बी) में साफ लिखा है कि नए फोन में इस ऐप को इंस्टाल करना होगा और उसे हटाया नहीं जा सकेगा और न ही किसी तरह बाधित किया जा सकेगा।
बेशक, साइबर अपराध एक बड़ी चुनौती है, लेकिन यह भी सच है कि इन पर अंकुश लगाने के लिए कई तरह के कानून और तकनीक पहले से मौजूद हैं।
संचार साथी ऐप इसी साल के शुरुआत में लांच किया गया है और सरकार का दावा है कि इसने छह लाख से ज्यादा फोन की चोरी पकड़ी, लेकिन आईएमईआई नंबर के जरिये चोरी गए या गुम गए फोन की तलाश करने की दूसरी तकनीकें पहले से मौजूद हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भी मोदी सरकार की चिंता समझ में आती है, लेकिन मुश्किल यह है कि वह किसी भी तरह के बदलाव की सारी जिम्मेदारी आम नागरिकों पर डाल देती है। पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना उठाए गए ऐसे हर कदम संदेह पैदा करते हैं।
यह नहीं भूलना चाहिए कि स्पाइवेयर पेगासस को लेकर पहले ही सरकार की नीयत पर सवाल उठ चुके हैं। अनेक विपक्षी नेताओं और पत्रकारों के मोबाइल फोन पर इस संदिग्ध जासूसी उपकरण की मौजूदगी का संदेह पहले ही जताया जा चुका है।
इस मनमाने कदम को लेकर विपक्ष का आरोप है कि सरकार लोगों की निगरानी करना चाहती है। जाहिर है, सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए और जब संसद का सत्र चल ही रहा है, तो आधिकारिक रूप से सदन के भीतर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

