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बिहार

बिहार में बड़ी संख्या में हैं भूमिहीन, लेकिन चुनावी अभियान में भूमि सुधार पर बात क्यों नहीं? 

राहुल कुमार गौरव
राहुल कुमार गौरव
Byराहुल कुमार गौरव
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Published: November 9, 2025 1:02 PM
Last updated: November 9, 2025 1:04 PM
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bihar katha
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‘बेमौसम बारिश ने हमारे जैसे हजारों किसानों को नुकसान के अलावा कुछ नहीं दिया है। फसल 20 दिनों के बाद कटने वाली थी।  ऐसा लगा कि हमारे सामने हमारा आहार लूट लिया गया है। जिसका खेत है, उसको क्या मतलब। वह सरकार से नुकसान के लिए क्यों लड़ेगा? हमारे जैसे बटाईदार किसानों को कोई फायदा नहीं मिलता है।’

बिहार के रोहतास जिले स्थित चेनारी प्रखंड के रहने वाले बटाईदार किसान संतोष मंडल अपना दुख इन शब्दों में व्यक्त करते हैं। उनके पास थोड़ी-सी जमीन है। वह बड़े किसानों से बटाई पर जमीन लेकर खेती करते हैं। 1 नवंबर से 3 नवंबर के बीच बिहार में भारी बारिश और तेज हवाओं के कारण धान की फसल बुरी तरह से बर्बाद हो गई है। 

2015 में हुई सामाजिक-आर्थिक जनगणना के अनुसार बिहार में संतोष जैसे भूमिहीन किसान परिवारों की संख्या लगभग 65 फीसदी है। जबकि यहां की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर निर्भर है। लगभग 80 फीसदी जनसंख्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि से जुड़ी है। पूर्व कृषि पदाधिकारी अरुण कुमार झा बताते हैं कि बिहार की बड़ी आबादी के पास बहुत कम या नहीं के बराबर खेत हैं। ये लोग जमीन लीज पर लेकर या बटाई  (फसल का निश्चित हिस्सा जमींदार को देना होता है) खेती करते हैं। अनुमान है कि 50 से 60 फीसदी किसान इसी तरह के हैं। इन किसानों के लिए अलग से कोई क़ानून नहीं है। ऐसे में वे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते हैं। बटाईदार किसानों को समुचित अधिकार दिए बिना खेती में सुधार संभव नहीं है।

महागठबंधन ने किसानों को जमीन बांटने का वादा कर दिया?

महागठबंधन के घोषणा पत्र में कहा गया है कि बंटाईदारों को जमीन का पहचान पत्र दिया जाएगा। फिर से पढ़िए… पहचान पत्र। इन पहचान पत्रों के माध्यम से उन्हें एमएसपी, केसीसी और अन्य सभी सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा। इस घोषणा के बाद बिहार के ग्रामीण इलाकों में चर्चाएं तेज हैं। सोशल मीडिया पर चर्चा है कि इससे बंटाईदार खेत के मालिक बन जाएंगे! 

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी बताते है, ‘जिस व्यक्ति ने बटाईदारी के सवाल को महागठबंधन के संकल्प पत्र में जुड़वाया है, वह तेजस्वी का पक्का विरोधी है। कर्पूरी ठाकुर, लालू यादव और नीतीश कुमार भी इस सवाल को उठा कर पीछे हट गए थे। ज्यादा तेज दौड़ने पर खरहा की तरह हार की संभावना रहती है। विक्ट्री के लिए कछुआ चाल ही ठीक होती है।’

कांग्रेस से जुड़े पल्लव यादव कहते हैं कि, ‘मेरा मत है कि यह जरूरी है लेकिन इसको चुनावी घोषणा पत्र में डालने की जरूरत नहीं थी। सरकार बनने पर घोषणा पत्र के बाहर का काम नहीं कर सकते, ऐसी कोई बाध्यता तो है नहीं फिर अभी क्यों विवाद पड़ना।‘

इंडिया गठबंधन ने भूमि सर्वे से जुड़े कार्यों को अपने संकल्प पत्र में शामिल किया है। संकल्प पत्र के अनुसार भूमि सर्वेक्षण व्यवस्था को सुसंगत बनाया जाएगा, बंद भूमि खातों को खोला जाएगा, एवं भूमि सर्वे में वास्तविक दखल व प्रकृति के आधार पर विवादित सर्वेक्षण किया जाएगा। बिहार में हाल के समय में भूमि सर्वे का कार्य चल रहा है। इसके शुरू होने के साथ ही कई तरह के सवाल और भ्रष्टाचार के मामले भी सामने आए हैं। यानी जिन मुद्दों पर सरकार घिरी, उन्हें विपक्षी गठबंधन ने चुनावी हथियार बनाया है। 

वरिष्ठ पत्रकार राजेश ठाकुर बताते हैं कि महागठबंधन ने भूमि सुधार जैसी व्यवस्था को अपने संकल्प पत्र में जरूर लिखा है, लेकिन इसे चुनावी मुद्दा नहीं बनाया है। वह जानते हैं कि ऐसे कानून के साथ छेड़छाड़ करने पर उनकी ही जाति के लोग उनके विरोध में हो जाएंगे। बिहार में सवर्ण के अलावा कई पिछड़ी जातियों में भी अच्छी खासी जमीन है। भाकपा माले पार्टी ने इसको संकल्प पत्र में जुड़वाया होगा, क्योंकि हमेशा से इस पार्टी का यह मुद्दा रहा है।

बिहार और भूमि सुधार 

जनगणना 2011 के जनसंख्या घनत्व डेटा के अनुसार बिहार सबसे घनी आबादी वाला राज्य है। इस वजह से सभी लोगों के लिए भूमि की उपलब्धता नहीं होने के कारण बिहार में जमीन विवाद के मामले हर साल बड़ी संख्या में दर्ज होते हैं। इस वजह से भूमि हमेशा से बिहार की राजनीति के केंद्र में रही है। भूमि सुधार.. बिहार में सबसे पहले इसकी शुरुआत की गई लेकिन बड़े पैमाने पर लागू नहीं किया गया और इसे लगभग ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। बिहार के विकास के लिए इसे केंद्रीय धुरी माना जाता है। फिर भी, चुनाव प्रचार के दौरान इसका कोई खास महत्व नहीं है। भूमि सुधार शायद ही कभी राजनीतिक मंच पर आ पाता है। 

आजादी के बाद बिहार देश का पहला राज्य था, जिसने जमींदारी प्रथा को समाप्त किया। लेकिन यह धरातल पर नहीं उतर सका। जमींदारों से बने सत्तारूढ़ दल में ऊंची जाति के जमींदार भरे हुए थे, जिन्होंने ज़मींदार-केंद्रित रास्ता चुना, जो असल में सिर्फ दिखावटी था। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के कार्यकाल में भी भूमि सुधार काफी चर्चित मुद्दा बना था। लालू प्रसाद यादव ने  भूमि सुधार को चुनावी मुद्दा बनाया, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्होंने भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। वहीं नीतीश कुमार के कार्यकाल में देवव्रत बंधोपाध्याय की अध्यक्षता में बिहार भूमि सुधार आयोग (2006-08) रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी। 

वरिष्ठ पत्रकार राजेश ठाकु कहते हैं, ‘इस रिपोर्ट में भूमि सुधार को लेकर कई सिफारिशें की गई थी। जैसे भूस्वामियों और सम्पदाओं द्वारा अवैध रूप से कब्जा की गई सीलिंग-अतिरिक्त भूमि की पहचान और अधिग्रहण का आह्वान किया गया था। इसके साथ ही हर बटाईदार को उस जमीन का पर्चा देना चाहिए, जिस जमीन पर वह खेती कर रहा है. इस पर्चे में भूस्वामी का नाम व खेत का नंबर रहेगा।.. इत्यादि। इस रिपोर्ट के आने के बाद सवर्ण और कई पिछड़ी जाति के नेता विरोध करने लगे। इसमें सिर्फ सत्ताधीश पार्टी नहीं, बल्कि विपक्ष पार्टी के नेता भी थे।‘

विरोध के बाद सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया। नीतीश कुमार ने 2013 में राज्य के महादलित परिवारों को तीन डिसमिल जमीन देने की योजना शुरू की। हालाँकि जमीनी हकीकत देखें तो अब लगता है कि यह सिर्फ एक दिखावटी कदम था। 

रक्तपात से सैकड़ों एकड़ भूमि मुक्त कराया

दलित और आदिवासियों के लिए काम कर रही एनएसीडीएओआर की एक रिपोर्ट में भूमिहीनता को बिहार में दलितों की गरीबी का सबसे बड़ा कारण बताया गया था। बिहार में गरीब और दलितों को भूमि सुधार को लेकर किए गए प्रयास पर रिटायर्ड शिक्षक और भागलपुर निवासी शंकर झा बताते हैं कि 1990 के दौर को देखें तो कम्युनिस्ट पार्टी ने अप्रत्यक्ष रूप से जमीन आंदोलन के जरिये पूरे बिहार में रक्तपात किया। जमीन छीनने का आंदोलन किया गया। सत्ताधारी पार्टी खामोश थी। इससे पहले भूदान आंदोलन में जमींदारों से छह लाख एकड़ जमीन लिया गया था। इसमें कुछ जमींदारों ने पहाड़, जंगल और अन्य बंजर जमीन दान में दे दी वहीं वितरण योग्य कई जमीनें भी अवितरित ही रहीं या उन पर फिर से कब्जा कर लिया गया। भूमिहीनों को कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा।

महागठबंधन विपक्षी गठबंधन के अहम घटक कम्युनिस्ट पार्टी यानी भाकपा (माले) (लिबरेशन) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने मीडिया से बात करते हुए कहा है कि ‘अगर हम नई सरकार का हिस्सा बनते हैं, तो हम देवव्रत बंद्योपाध्याय आयोग की सिफारिशों के अनुसार भूमि वितरण पर ज़ोर देंगे।‘

प्रशांत किशोर भूमि सुधार पर बताते हैं कि, “एक तिहाई जमीन का मालिकाना हक disputed है। भूदान आंदोलन में लाखों एकड़ जमीन लोगों ने दान किया उसका कोई हिसाब नहीं है। भूमि सुधार लागू होने से जमीन मालिकों को फायदा होगा उनकी जमीन की प्रोडक्टिविटी और वैल्यू दोनों बढ़ेगी। साथ ही भूमिहीनों को भी फायदा होगा, उनको जमीन दिया जाएगा।

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