दूसरे विश्व युद्ध के बाद संभवतः वैचारिक रूप से दुनिया इस तरह शायद पहले कभी बंटी नहीं थी, जिसकी आंच इस साल घोषित किए गए शांति के नोबेल में भी महसूस की जा सकती है।
शुक्रवार को स्टॉकहोम में नोबेल कमेटी ने वेनेजुएला की विपक्ष की भूमिगत नेता मारिया कोरिना मचाडो को इस साल का शांति का नोबेल देने का ऐलान करते हुए उन्हें लोकतंत्र का अनथक योद्धा बताया है, जो अपने देश की निरंकुश सत्ता के खिलाफ निरंतर संघर्ष कर रही हैं। नोबेल कमेटी ने कहा कि उन्होंने गहराते अंधकार में लोकतंत्र की लौ को जलाए रखा है।
वह आर्थिक रूप से जर्जर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की मुखर विरोधी हैं। निस्संदेह अपने देश के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए किए जा रहे उनके संघर्ष को नकारा नहीं जा सकता। वह किन ताकतों से लड़ रही हैं, उसे समझने के लिए यही काफी होगा कि वह पिछले 14 महीने से भूमिगत हैं। उन्हें पिछले साल हुए राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा लेने से रोक दिया गया था, जिसमें निकोस मादुरो की जीत हुई थी। मादुरो के चुनाव की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे थे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक तौर पर उनके निर्वाचन को खारिज कर दिया गया था। दूसरी ओर मचाडो ने तमाम धमकियों के बावजूद अपना देश छोडने से मना कर दिया और वेनेजुएला में रहते हुए ही वह संघर्ष कर रही हैं। यह अपने आपमें इसलिए भी बड़ी बात है, क्योंकि बीते नौ सालों में वहां 73 लाख से अधिक लोग देश छोड़ कर जा चुके हैं।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि मचाडो मादुरो के विरोध में इस हद तक चली गईं कि उन्होंने वेनेजुएला पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों का समर्थन किया! वास्तव में रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि किसी भी तरह के आर्थिक प्रतिबंध किसी नैतिकता से नहीं, बल्कि गहराते राष्ट्रवाद और आर्थिक हितों से नियंत्रित होते हैं। आखिर डोनाल्ड ट्रंप आज टैरिफ और प्रतिबंधों के जरिये अन्य देशों पर दबाव बना रहे हैं, उसे इससे अलग कैसे माना जा सकता है। हैरत नहीं, डोनाल्ड ट्रंप इस बार खुद को शांति के नोबेल का सबसे बड़ा दावेदार बता रहे थे और जिन मचाडो को इस बार चुना गया है, वह उनकी प्रशंसक हैं। और अपना नोबेल वेनेजुएला के लोगों के साथ ही उन्हें समर्पित कर दिया है।
यही नहीं, मचाडो इस्राइल के राष्ट्रपति नेतान्याहू की समर्थक हैं, जिनकी अगुआई में इस्राइली सेना की बर्बरता ने गजा को इस समय के सबसे बड़े मानवीय संकट में डाल दिया है। 2020 में मचाडो की वेटें वेनेजुएला पार्टी ने नेतन्याहू की लिकुड पार्टी से सहयोग को लेकर एक समझौता भी किया था। सात अक्टूबर, 2023 को हमास के इस्राइल पर किए गए बर्बर हमले का विरोध करते हुए मचाडो ने कहा था कि आतंकवाद का हर हाल में खात्मा किया जाना चाहिए।
लेकिन उसके बाद इस्राइल की गाजा में की गई ज्यादतियों पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा है; जाहिर है, उनकी इस चुप्पी को संदेह की नजर से देखा ही जाएगा। याद किया जा सकता है कि शांति के नोबेल से नवाजी गईं म्यांमार की लोकतंत्रवादी नेता आंग सांग सू ने किस तरह से अपने देश में रोहिंग्या मुस्लिमों पर की गई ज्यादतियों पर चुप्पी साध ली थी!
दरअसल इस समय दुनिया में लोकतंत्र को जिस तरह की चुनौतियां मिल रही हैं, उसके आइने में भी मचाडो के काम को देखा जाना चाहिए। नोबेल कमेटी ने मचाडो के नाम का ऐलान करते हुए कहा है, ‘दुनिया भर में सत्ता में बैठे लोग क़ानून का दुरुपयोग कर रहे हैं, स्वतंत्र मीडिया को चुप करा रहे हैं, आलोचकों को जेल में डाल रहे हैं, और समाज को सत्तावादी शासन और सैन्यीकरण की ओर धकेल रहे हैं। 2024 में, पहले से कहीं ज्यादा चुनाव हुए, लेकिन स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कम होते जा रहे हैं।‘
नोबेल कमेटी के इन शब्दों से ही साफ है कि सिर्फ चुनाव जीतना लोकतांत्रिक अधिकारों की जीत की गारंटी नहीं है, उम्मीद है अपने देश में लोकतंत्र की सही मायने में स्थापना के लिए संघर्ष कर रही मचाडो इसे समझ रही होंगी।
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